आखिर कौन हैं ये लिंगायत जो कर्नाटक चुनाव के दौरान हर पल बने रहे चर्चा का विषय, क्या है इनका राजनीतिक कनेक्शन

आखिर कौन हैं ये लिंगायत जो कर्नाटक चुनाव के दौरान हर पल बने रहे चर्चा का विषय, क्या है इनका राजनीतिक कनेक्शन

दक्षिण भारत में चल रहे चुनाव के दौरान आपने देखा होगा की सभी चुनावी दल अपनी ताकत हर तरफ से लगा रह था फिर चाहे वो मोदी जी की बीजेपी पार्टी हो या फिर राहुल गांधी की काँग्रेस पार्टी या फिर अन्य। मगर मुख्य मुक़ाबला तो इन्ही दोनों पार्टियों का था। खैर फिलहाल चुनाव हुआ, नतीजे आए और आखिरकार कर्नाटक में भी बीजेपी ने कमल खिला ही लिया।

मगर इस सब के दौरान कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर एक समुदाय का नाम सुर्खियों में ला दिया है वो है लिंगायत। आपने टीवी पर अखबार में या इंटरनेट या सोशल मीडिया पर लिंगायत का बहुत बार नाम सुना होगा मगर आखिर ये है क्या और चुनाव में इसका क्या रोल है इसकी जानकारी ज़्यादातर लोगों को नहीं है।

आखिर कौन हैं ये लिंगायत जो कर्नाटक चुनाव के दौरान हर पल बने रहे चर्चा का विषय, क्या है इनका राजनीतिक कनेक्शन

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असल में आपको बता दें की यह एक ऐसा महकमा है जो लंबे समय से अलग धर्म की मांग कर रहा है और इस बार कर्नाटक की राजनीति काफी हद तक इसी के चरो तरफ घूमती नजर आई। जानकारी के लिए बता दें की कर्नाटक की कुल आबादी का करीब 17% हिस्सा लिंगायत का है, लिंगायत समुदाय एक समाज सुधार आंदोलन से बना है। लिंगायत समुदाय की परंपरा हिंदुओं से अलग है, ये समुदाय अपने इष्टलिंग को मानता है और खास बात ये है की इसको मानने वाले लोग हमेशा अपने शरीर से बांधकर रखते हैं, ये इष्टलिंग अंडाकार होता है जिसे रुद्राक्ष की माला में या साधारण धागे के साथ बांधकर रखते हैं।

बताया जाता है की 12वीं शताब्दी में ब्राह्मण परिवार में जन्मे बासवन्ना ने हिंदु समाज की कुरीतियों के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया था और उसी समय से उन्होंने लिंगायत समुदाय की स्थापना की थी, आपको बता दें की ये वैदिक धर्म को ना मानने वाला एक समुदाय है।आपको बताना चाहेंगे की ये समुदाय मूर्ति पूजा में कोई विश्वास नहीं रखता है और तो और इस समुदाय का मानना है कि ये इष्ट लिंग ही इनकी आंतरिक चेतना का प्रतीक है और इसी से सारी सृष्टि की रचना हुई है।

किंगमेकर हैं लिंगायत

इसके पहले भी राजनीति में इंका बहुत ही एहम रोल रहा है, बता दें की’ 2013 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते येदियुरप्पा को को बीजेपी से निकाला गया तो लिंगायतों ने कांग्रेस के सिद्धारमैया को अपना समर्थन दे दिया। इस बार वर्ष 2018 के चुनाव में येदिरप्पा ने कर्नाटक में वापसी की तो नतीजे उनके पक्ष में आ गए और यही वजह है की लिंगायत को यहाँ का किंगमेकर के रूप में देखा जाता है।

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400 मठ, हजारों संत

आप सोच रहे होंगे की लिंगायत समुदाय का कर्नाटक में कितना वर्चस्व है तो बता दे की इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि 30 जिलों वाले कर्नाटक राज्य में कुल 400 लिंगायत मठ हैं और आपकी जांकरी के लिए बता दें की ये मठ ही यहां कि राजनीतिक धारा को नियंत्रित करते हैं और इस बार के कर्नाटक चुनाव का पूरा नक्शा लिंगायत की धुरी पर ही हुआ है और इसे बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू माना गया है।

 

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