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आत्मनिर्भरता की मिसाल हैं पातालकोट के जंगलों के आदिवासी, केवल नमक खरीदने के लिए आते हैं बाहर

एक तरफ जहाँ सारी दुनिया कोरोना के डर से घर में कैद होकर रह गई है वहीं मेरा मन मेघों के साथ अठखेलियाँ करने के लिए उतावला हो रहा था। कोरोना के डर से घर में रहने वालों की स्थिति यह है कि वह रोज़ अलग-अलग प्रकार के तनाव से जूझ रहे हैं। जबकि मैं सोचती हूं कि अगर हम अपनी पुरातन परंपराओं से जुड़ जाएंगे तो शायद करोना को मात दे सकेंगे। इसी की खोज मुझे ले आई है सतपुड़ा के जंगलों में। मैंने सुन रखा था कि सतपुड़ा की पहाड़ियों में एक पातालकोट नाम की ऐसी जगह है, जहाँ सदियों से एक ऐसा आदिवासी समाज रहता है जोकि हर मायने में आत्मनिर्भर है। वह केवल नमक ख़रीदने उन गहराईयों से ऊपर आता है।

पातालकोट

जंगल मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है। बचपन में जब ट्रेन में बैठ कर मुंबई की यात्रा के लिए जा रही होती थी तो खिड़की से झांकते हुए पूरा जंगल इस हसरत के साथ निहारती थी कि काश कभी जिंदगी में ऐसा मौका मिले कि मैं इन जंगलों को दूर से नहीं बल्कि उनके भीतर से देख सकूँ। उस में प्रवेश कर सकूँ, उन्हें सुन सकूं, महसूस कर सकूं। वहां के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, पत्थर वनस्पति,नदी नाले, हवाएं खुशबू हर चीज को नजदीक से निहार सकूं। उसके साथ एक तारतम्य  बना सकूं और प्रकृति के शाहकार को सर झुका कर नमन कर सकूं। ना मालूम बचपन की उस इच्छा को ईश्वर ने कितनी ही बार सुना है।

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अब जैसे ही लॉकडाउन खत्म हुआ तो मैंने कमर कसी कि मैं इन्हीं जंगलों से अपने यात्राओं की शुरुआत करूंगी। तो मैं चली आई सतपुड़ा के घने जंगलों की करवटों में छुपे एक ऐसे स्थान की खोज में जिसकी बहुत सारी कहानियां सुनी थी मैंने। छिंदवाड़ा जिले के मुख्यालय से 78 किलोमीटर की दूर सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच एक ऐसा जंगल है, जिसमें जगह-जगह पर कुछ अनदेखे अनछुए चमत्कार सदियों से सांस ले रहे हैं। यहीं पर लगभग 17 फीट नीचे बसा है पातालकोट।

कहां है पातालकोट

कहते हैं समुद्र तल से लगभग 750 से लेकर 950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है यह जगह। यह जादुई स्थान 79 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। यहां पर भारिया आदिवासी समाज रहता है जोकि भारत में पाए जाने वाले चुनिन्दा विशेष पिछड़ी जनजाति में से एक है। यह मध्य प्रदेश में पाई जाने वाली तीन आदिवासी जनजातियों बैगा, सहरिया और भारिया में से एक है। यहाँ भारिया आदिवासी समाज के 12 गांव है जो अपनी संस्कृति अपना इतिहास अपनी भौगोलिक स्थिति में हर मायने में अलग है। यहाँ आने से पहले मुझे पातालकोट के बारे में तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिली थी। यह कहानी अपने आप में इतनी रोचक थी कि मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी।

पातालकोट में रहने वाले लोग अपने आप में इतने आत्मनिर्भर हैं कि वह केवल नमक खरीदने ऊपर आते हैं। बाकी अपनी जरूरत की हर चीज वह स्वयं पैदा करते हैं और वनों से हासिल करते हैं। मुझे लगा कि जब देश पोस्ट कोरोना काल में आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में यह आदिवासी तो सदियों से आत्मनिर्भर हैं क्यों न इन्हीं से गुरु मन्त्र ले लिया जाए। लेकिन यह ज्ञान बिना डूबे नहीं मिलने वाला था। इसके लिए मुझे पातालकोट की गहराईयों में उतरना होगा।

पहले यहां पहुंचने के लिए सड़क नहीं थी

कुछ वर्ष पहले तक तो पातालकोट पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं थी। आदिवासी लोग खड़े पहाड़ पर लताओं और पेड़ों की जड़ों को पकड़ कर ऊपर आते थे। वह  खड़े पहाड़ के किनारे किनारे बनी पगडंडियों पर चढ़ते हुए बड़ी महारथ से ऊपर आ जाया करते थे। जबकि हम जैसे लोग वहां जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकते हैं। लेकिन समय बदला और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिए पातालकोट तक सड़क पहुंची, तो आज दुनिया के लिए वहां तक पहुंचना उतना मुश्किल नहीं है जितना कि कुछ वर्ष पहले तक रहा था। जब आपको जंगल में पगडंडियों से होते हुए गहराई में उतरना होता था यह बहुत जोखिम भरा रास्ता था। यहाँ के  लोग अभी भी अपनी आदिम पद्धतियों द्वारा जंगल से प्राप्त की जड़ी जड़ी बूटियों से इलाज करते हैं। फिर चाहे वह सांप के काटे का इलाज हो या फिर सामान्य प्रसव कराने के लिए कमर में कोई जड़ी बूटी बांधना हो यह लोग पूरी तरह से प्रकृति के साथ एक ले हो कर जी रहे हैं।

पातालकोट का एक घर

पातालकोट की विशेषताओं के बारे में क्या कहा जाए। जैसे-जैसे में जंगल में अंदर की ओर पहुंचती जा रही थी मेरे आस-पास के का परिदृश्य बदलता जा रहा था। मैं तामियां की परिधि में प्रवेश कर रही थी पहाड़ों की ऊंचाई को चढ़ती जा रही थी और जंगल घने होते जा रहे थे। ढ़ाक, आचार, सागौन, महुआ, आंवला चिरौंजी से भरे ये जंगल बारिश में इतने खुबसूरत लगते हैं कि आँखों में नहीं समाते। मैं गाड़ी की अगली सीट पर बैठी कार की खिड़की के शीशे नीचे कर इस दुनिया को देख रही थी।

मैं यहाँ एक तरफ का टिकट लेकर आई हूँ और जब तक वापस नहीं जाऊँगी जब तक अपने भीतर की बॉयोलोजिकल क्लॉक को रिसेट नहीं कर लेती। डीटोक्सिफिकशन का ये मेरा ईजाद किया तरीका है। मैं जैसे-जैसे इस जगह के नजदीक पहुँच रही हूँ। मुझे अहसास होने लगा है कि यह स्थान प्रकृति और पुराण दोनों के अद्भुत संगम से उपजी है।

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पौराणिक कथाओं में पातालकोट

पातालकोट के 12 व्यू प्वाइंट है। पातालकोट के जानकर पवन श्रीवास्तव दावा करते हैं कि पातालकोट हर व्यू पॉइंट से अलग नज़र आता है। ऊपर से देखने पर पातालकोट घोड़े की नाल जैसा दिखाई देता है। कुछ लोग मानते हैं कि पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां से पाताल जाने का रास्ता है और रामायण के पात्र रावण के पुत्र मेघनाथ भगवान शिव की आराधना कर पाताल  लोक  इसी रास्ते से गए थे। तामिया व्यू पॉइंट पर खड़े होकर मैं उस अद्भुत नजारे को निहार रही थी। जहाँ से नीचे पातालकोट नज़र आ रहा था। लोग सही कहते हैं पातालकोट में लोग छोटे छोटे होते हैं। ऊपर से देखने में तो किसी मिनिएचर वंडर लैंड जैसा दिख रहा है पातालकोट।

मेरी नज़र के सामने परत दर परत सतपुड़ा की पहाड़ियां फैली हुई हैं। जहाँ धरती और आकाश मिलते हैं उस क्षितिज तक नीचे हरियाली और ऊपर मेघों से भरे काले बादल किसी प्रेमी युगल से मधुबन में अटखेलियाँ कर रहे थे। बादलों को ऐसे नाचते हुए मैंने पहले कभी नहीं देखा।

पहाड़ों से घिरा पातालकोट

पातालकोट की गहराई को देख मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है कि उस समय इतनी ऊंचाई से लोग क्या करने इस गहरी खाई में गए होंगे। इसका जवाब इन जंगलों को दिखाने वाले मेरे वन सारथी पवन श्रीवास्तव बड़े ही मजेदार अंदाज में देते हैं। वह बताते हैं कि जब अंग्रेजों से बचकर नागपुर के राजा भोसले छुप रहे थे तो उन्होंने यहीं आकर शरण ली थी इसके प्रमाण पतालकोट की गहराई में स्थित राजा खोह नाम की एक गुफा में मिलते हैं। कहते हैं यहाँ से होकर एक सुरंग पंचमनी तक जाती है। उस समय गोखले सम्राट के साथ बोझा  उठाने वाले लोग भी आए थे। अपने कंधों पर भार उठाकर पहाड़ों की गहराइयों में उतरने वाले यह लोग यहीं बस कर रह गए और भार उठाने वाले होने के कारण इनका नाम भारिया पड़ा। कलान्तर में  में भारिया एक आदिवासी जनजाति के रूप में विकसित हुई। भारिया जनजाति द्रविड़ समूह से है।

भारिया समाज की एक महिला

पातालकोट का जलवायु इतनी सरल और सुगम थी कि लोग यहीं के होकर रह गए। वनों से आती ठंडी हवाएं, कम धूप आने के कारण ठंडक का बना रहना, खेती के लिए मिट्टी, पहाड़ों की पतली पतली दरारों से प्राकृतिक रूप से छनकर आता मिनरल वाटर, नजदीक बहती दूधी नदी और क्या चाहिए जिंदगी जीने के लिए। पातालकोट पहुंचकर कर मैं पातालकोट की अंतिम सिरे पर बसा गांव कारेआम पर जाकर एक दम ठहर गई। जब मैं वहां पहुंची तो वहां जाकर मुझे ऐसा ही महसूस हुआ कि यहां आकर जो भार उठाने वाले लोग वापस नहीं गए वह क्यों नहीं गए होंगे जिसको प्रकृति इतने शुद्ध रूप में हासिल हो जाए वह फिर दूषित वातावरण में जाने की क्यों सोचेगा। उस वक्त मेरा मन हुआ कि मैं भी सब कुछ छोड़ छाड़ कर यही रह जाऊं।

क्या है कारेआम

तभी मेरी नज़र यहाँ के मील के पत्थर पर पड़ी। जिस पर अंकित था कारेआम।  यह नाम थोड़ा अलग है। जहाँ मैं खड़ी थी। वहां आमों का एक बगीचा था। लेकिन यह कोई आम बगीचा नहीं था। अभी दोपहर के दो बजे थे लेकिन इस स्थान पर सूरज की रौशनी नहीं थी। यहाँ धूप नहीं आती है। मैंने पूरे भारत में भांति भांति के आम के पेड़ देखे हैं। मैंने बंगाल में जनवरी माह में आम के पेड़ों पर फल उगते हुए देखा है। लेकिन यहां जैसे आम के पेड़ मैंने कहीं नहीं देखें। आम का पेड़ मतलब एक ऐसा घना फैला हुआ वृक्ष जो कि नीचा नीचा होता है। झुका हुआ होता है। लेकिन कहीं पर भी आम का वृक्ष सीधा नहीं होता। यूकेलिप्टस के पेड़ की तरह लंबा नहीं होता। मैंने मेरे वन सारथी पवन श्रीवास्तव से पूछा कि पवन जी यह आम का पेड़ अलग क्यों है।

पवन ने बड़े पते की बात बताई उन्होंने कहा कि यह पातालकोट के इस स्थान पर सूर्य की रोशनी बहुत कम आती है यानी के यहां अंधेरा रहता है इसीलिए जगह का नाम पड़ा कारेआम। मतलब देशज भाषा में कारे मतलब काला, और  काला मतलब अंधेरा। अर्थात वह जगह जहां अंधेरा है और आम के पेड़ हैं। तो इन पेड़ों ने अपने आप को प्रकृति के अनुसार ढाल लिया और फोटोसिंथेसिस के लिए अपने आप को ऊंचा और लंबा किया । ताकि वह थोड़ी ऊंचाई हासिल करके धूप के साथ प्रकाश संश्लेषण कर अपनी अपने आप को जीवित रख सके।

मैं मंत्रमुग्ध उन पेड़ों को देखे जा रही थी। पास ही एक झरना बह रहा था जिसकी कल कल का शोर मुझे किसी संगीत जैसा लग रहा था। ये  मैं कहां हूं मुझे खुद पता नहीं। बरसात के इस मौसम में जंगल जैसे फूट पड़ रहा है। हालाँकि यहाँ बहुत बारिश होती है लेकिन यहाँ पानी ठहरता नहीं है। मध्य भारत की दो महत्वपूर्ण नदियों गोदावरी और नर्मदा बेसिन के रिज लाइन पर बसे इस जादुई लोक का पानी नर्मदा से होकर अरब सागर पहुँचता है और गोदावरी से होकर बंगाल की खाड़ी में जाता है। यहाँ के लोगों के लिए पीने के पानी का प्रबंधन एक चुनौती है। लेकिन प्रकृति का हिस्सा होने के कारण इन लोगों ने धैर्य सीख लिया है। यह लोग पानी की एक एक बूंद का मोल पहचानते हैं। यह लोग पहाड़ों से रिस रिस कर आने वाले पानी का संग्रहण करते हैं। इस जंगल में जगह जगह यह लोग बांस की खपच्चियाँ लगा उस बूंद बूंद पानी को जमा करते हैं। पहाड़ों की दरारों से रिस कर आने वाला पानी शुद्ध और मिनरल से भरपूर होता है।

कुछ ऐसे हैं पातालकोट के झरने

यहाँ हरियाली का दुशाला ओढ़े प्रकृति का यौवन अपने चरम पर है। यहां जगह-जगह पानी के सोते अनायास ही फूट पड़ते हैं। वह कहीं नदी तो कहीं नालों का रूप लेते हैं। कहीं छोटे झरना तो कहीं हल्की सी धार के रूप में नजर आते हैं। कहीं  झुक कर पानी पीने का मन करता है तो कहीं पैर डाल कर बैठ जाने को जी करता है। मैं जंगल में जैसे-जैसे घुमावदार मोड़ों से गुज़रती हूं हवा का एक झोंका जंगल की खुशबू मेरे अंदर तक भर देता है। यह सम्मोहन है प्रकृति का। मैं जंगल में इतना खो गई कि भूख का अहसास ही नहीं रहा मेरे सारथी पावन ने यहीं एक आदिवासी परिवार में हमारे भोजन का प्रबंध किया था। हमने  छक्क के  खाना खाया। और इतना खा लिया कि दिल किया कि यहीं आराम करें कहीं न जाएँ।  मैंने गृह स्वामिनी से निवेदन किया कि हमें थोड़ी देर यहां आराम करने दिया जाए। सच कहूँ तो ये सौंधी सौंधी मिटटी से लिपा घर जिसकी छत मिटटी की खपरैल से बनी है मुझे अपने मोह में बांध रही थी। जिसमें कोई पंखा या कूलर नहीं है लेकिन फिर भी ठंडक है। दिल्ली स्थित मेरे घर में चौबीस घंटे एसी चलाने को मजबूर मैं कुछ देर ही सही वहां रुक जाना चाहती थी।

मैं वही लेट गई मेरी नज़र छत पर पड़ी। लेटे लेटे छत को देखती हुई मैं सोच रही थी कि मिट्टी की खपरैल और बांस से बनी यह छत परंपरागत होते हुए भी बहुत आधुनिक है। यह हर मौसम से लड़ने के लिए मजबूती तो रखती ही है साथ में घर के भीतर हवा का प्रवाह भी सुनिश्चित करती है। यह घर गर्मी में ठंडे और सर्दी में गर्म रहते हैं। मिट्टी से लिपे फ़र्श पर लेटे हुए मेरी कब आंख लग गई मुझे पता ही नहीं चला। जब उठी तो बहुत ताज़ादम थी। इतनी उर्जा पहले कभी महसूस नहीं की थी।  फटाफट से तैयार हो गई। मुझे अभी बाकी बचा जंगल देखना था। चिमटीपुर व्यू पॉइंट से सूर्यास्त देखना था। हम एक बार फिर जंगल के घुमावों को पार करते हुए ऊपर की ओर आ रहे थे। मन में इच्छा हुई कि कहीं से मीठे मीठे जामुन खाने को मिल जाएँ। मैंने अपने सारथी से इच्छा ज़ाहिर कि तो उन्होंने झट एक गाँव घट्लिंगा की ओर गाड़ी मुड़वा दी। इस गाँव में हमें माताराम(यानीकि भारिया समाज में वयोवृद्ध महिला को माताराम कहते हैं) से मिलना था जिनके हाथों और पैरों पर गोंडवाना पारंपरिक गोदना बने होते हैं। इस गाँव के युवाओं ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया। और झट से बड़े से जामुन के पेड़ पर चढ़ ढेर सारी जामुन तोड़ कर हमें खाने को दी।

यहाँ की एक बहुत अच्छी बात है। यह आदिवासी समाज बहुत ओपन है। यह खुली बाँहों से आगंतुकों का स्वागत करता है। पातालकोट के भोले भाले यह लोग बहुत सरलता से मिलते हैं। हम जामुन खा लोगों से मिल वहां से आगे बढ़े।

पातालकोट के लोग

रास्ते में सड़क पर बैठी हुई कुछ महिलाऐं एक प्रकार के बीजों को साफ कर रही थी, मैंने पूछा। पता चला यह महुआ के फल की गुठली है जिसके बीजों से पीसकर तेल निकाला जाता है और यह तेल साबुन बनाने और कॉस्मेटिक आदि में प्रयोग किया जाता है। इन जंगल में आंवला, हरड, सीताफल आदि जड़ी बूटियां पैदा होती हैं यह जंगल चिरौंजी का भी घर है आपको जानकर हैरानी होगी कि एशिया की सबसे बड़ी चिरौंजी की मंडी यही छिंदवाड़ा जिला में है और यह केवल एक ही वन से प्राप्त उपज है। यहाँ  आदिवासी लोग वन में जाकर चिरौंजी बीन कर लाते हैं और फिर उसको प्रोसेस किया जाता है।

यहाँ एक प्रकार का शहद पैदा होता है जिसे रॉक हनी कहा जाता है। इसे छोटी मधु मक्खी बनाती है। वह पहाड़ों पर ऊँचे स्थानों पर अपना छत्ता बनाती है। यह शहद औशाधिए गुण वाला होता है। इसे आँखों में लगाने से नज़र का चश्मा हट जाता है। पातालकोट के जंगलों में 220 प्रकार की जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। इनके बीच पारंपरिक औषधियों से इलाज करने की परंपरा है। जिसे करने वाले को भूमका कहा जाता है। जंगलों में पैदा होने वाली इन दवाइयों की पहचान लगभग सभी भारिया लोगों को होती है। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती रहती है।

जड़ी बूटी तैयार करतीं एक आदिवासी महिला

भारिया आदिवासी जंगलों को अपने होने का कारक मानते हैं। वह जंगलों से उतना ही लेते हैं जितना कि वह उन्हें वापस कर सकें। इसीलिए इस समाज के घरों में अलमारियां नहीं होती। सिर्फ ज़रूरत का समान होता है। हर घर के पास एक खेत होता है जिसमे वह अपनी ज़रूरत का अनाज और शाक उगाते हैं।

भारिया समाज जंगलों को लेकर बहुत भावुक है। वह कभी भी किसी हरे पेड़ पर कुल्हाड़ी नहीं चलाते। यहाँ तक कि घर बनाने के लिए जंगल में गिरे हुए पेड़ उठा कर लाते हैं। आज तक कभी भी किसी भारिया द्वारा जंगल के दोहन की कोई घटना सामने नहीं आई। भारिया समाज के अनेक परम्पराएं हिन्दू परम्पराओं से मेल खाती हैं लेकिन मृत्यु के बाद के संस्कार बिलकुल अलग हैं। इनके लिए मृत्यु एक उत्सव है।

यह लोग घर के पास ही वयोवृद्ध व्यक्ति को दफनाते हैं। और वापसी में वहां से एक पत्थर लाकर उस पर मूर्ति उकेर कर घर के आंगन में कहीं स्थापित करते हैं। इनका मानना है कि मरने के बाद उनके पूर्वज कहीं जाते नहीं हैं बल्कि उस मूरत में रह कर परिवार के पास ही बने रहते हैं और ज़रूरत पड़ने पर परिवार की रक्षा करते हैं।

पारंपरिक रूप से खेती करने के कारण इन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है। यह हर प्रकार की व्याधि का इलाज पारंपरिक औषधियों में ही तलाशते हैं। इस समाज के बारे में इतना कुछ जानने के बाद मैं सोचती हूँ कि पातालकोट और तान्या के आसपास फैले हुए जंगल उन लोगों के लिए बने हैं जो बहुत बारीकी से प्रकृति द्वारा दी गई एक एक नेमत को सर माथे लगाना जानते हैं।

जो बारिश की बूंदों के साथ अठखेलियां करना चाहे, जो उड़ते हुए बादलों के सिरे पकड़ के उड़ना चाहे जो दूर तक फैले घास के मैदानों पर छोटा सा एक टेंट लगाकर रात में तारे गिनना चाहे, जो  जुगनू को पकड़ना चाहे, जो इंद्रधनुष के रंगों को गिनना चाहे.. जो प्रकृति के साथ एक ले होकर बहते हुए पानी में पैर डालकर घंटों बैठ सकें। जो शांति को अपने भीतर ले जाना चाहे और जहां मन करे वहां रुक कर मेडिटेशन करने  से अपने आप को रोक न पाएं। अगर आप ऐसा करने में विश्वास रखते हैं तो एकबार पातालकोट की यात्रा जरूर करें।

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