मरते हुए धूमकेतु का अध्ययन देगा हमारे सौरमंडल के बारे में कई अहम जानकारी, जानें कैसे

 

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए ग्रह और तारे ही नहीं बल्कि धूमकेतु या पुच्छला तारा जैसे खगोलीय पिंड भी अध्ययन का विषय हैं.  एक नए शोध से पता चला है कि पुच्छल तारे में कार्बन की उपस्थिति से काफी कुछ पता चल सकता है जिसमें सबसे खास बात यह है कि ये दर्शाते हैं कि ये हमारे सौरमंडल में कितने समय तक रहे.

कर्बन की उपस्थिति या कमी

रूस की फार ईस्टर्न फेडरल यूनिवर्सिटी, दक्षिण कोरिया और अमेरिका के खगोलविदों का कहना है कि पुच्छल तारे में कार्बन की उपस्थिति या कमी यह बताती है कि वह सौरमंडल में कितने समय तक रहा है. इस सयुंक्त अध्ययन के नतीजे वैज्ञानिक जर्नल मंथली नोटिसेस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुए हैं.

कम स्तर का मतलब

इस अध्ययन के मुताबिक यदि धूमकेतु में कार्बन के स्तर कम हैं तो इसका मतलब है कि वह सूर्य के पास लंबे समय के लिए रहा है. शोधकर्ताओं ने दो महीने पहली ही पृथ्वी के पास से गुजरे एटलस धूमकेतु के अध्ययन के आधार पर ये नतीजे निकाले हैं.  इस धूमकेतु में से बड़ी मात्रा में कार्बन के कणों का विखंडन हुआ था.

क्या किया अध्ययन

रिपोर्ट के मुताबिक FEFU के एस्ट्रोफिजिसिस्ट एक्तेरीना चोर्नाया और एंटोन कोचरजिन अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम में शामिल थे जिन्होंने एटलस धूमकेतु के शेल और पूंछ के हिस्से के धूल के कणों की संयोजन का अध्ययन किया था. शोधकर्ताओं का करना है कि धूमकेतु में कार्बन पदार्थों का स्तर काफी ज्यादा था.

किस धूमकेतु का किया अध्ययन

एकतेरीना चोर्नाया का कहना है कि साल 2020 में पृथ्वी से देखे जाने वाले धूमकेतुओं में से एटलस सबसे चमकीला धूमकेतु था लेकिन इसे देखने की जगह सभी ने इसका विखंडन ही देखा. उनके मुताबिक सौभाग्य से उनके साथियों ने यह प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इसका फोटोमैट्रिक और पोलरिमैट्रिक अध्ययन शुरू कर दिया था. जिसकी वजह से वे कोमा (यानि धूमकेतू के शेल और उसकी पूंछ के संयोजन का अध्ययन कर उनकी तुलना करने में कामयाब रहे. शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन धूमकेतु के विखंडन के पहले और बाद दोनों समय में किया.

क्यों खास था यह धूमकेतु

शोधकर्ताओं ने विखंडन के दौरान उन्होंने सकारात्कम ध्रुवीकरण में नाटकीय वृद्धि देखी. जिसमें समान रूप से कार्बन पदार्थों के कणों की मात्रा बहुत ज्यादा थी. कॉमेट एटलस एक लंबे अंतराल वाला धूमकेतु था जो 5,476 सालों में एक बार हमारे सौरमंडल में प्रवेश करता था. ऐसे धूमकेतु सौरमंडल में बहुत कम ही प्रवेश करते हैं और इसी लिए ये कभी कभी ही गर्म होते हैं.

शोधकर्ताओं की अधिक दिलचस्पी का कारण

शोधकर्ताओं की इस तरह के पिंडों में दिलचस्पी होने की खास वजह भी है. ये पिंड बहुत पुराना पदार्थ अपने साथ लेकर चलते हैं जो सूर्य की गर्मी से वाष्पीकृत होने लगता है जिसका वैज्ञानिक अध्ययन कर सकते हैं. यह पदार्थ  तब बना था जब हमारा सौरमंडल अपने शुरुआती समय में था.

क्यों होता है धूमकेतु का अध्ययन

दुनिया भर के वैज्ञानिक धूमकेतु के सिरे और पूंछ के पदार्थ कणों का संयोजन का अध्ययन करते हैं. इससे वे हमारे सौरमंडल के विकास के बारे में जानकारी हासिल करने की उम्मीद करते हैं.  इसके लिए वे इन कणों में प्रकाश को अवशोषित, परावर्तित या ध्रुवीकृत करने की क्षमता का विश्लेषण करते हैं शोधकर्ताओं का कहना है कि इन कणों का पोलरिमैट्रक अध्ययन से पता चलता है कि एटलस धूमकेतु के कण पृथ्वी के इतिहास में अब तक के सबसे चमकीले धूमकेतु  हेल-बॉप धूमकेतु के कणों से मेल खाते हैं. वहीं छोटे अंतराल वाले धूमकेतु यानि वे धूमकेतु जो बहुत जल्दी हमारे सूर्य के पास आते हैं उनमें इस पुरातन पदार्थ की मात्रा काफी कम होती है.

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