इस बार किस दिन है शरद पूर्णिमा, जानें व्रत पूजा विधि, शुभ मुहूर्त एवं महत्व

शरद पूर्णिमा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कहा जाता हैं, इसे रास पुर्णिमा के नाम से भी जाना जाता हैं| ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक पूरे साल में केवल इस दिन ही चंद्रमा सोलह कलाओं से निपुण होता है और इससे निकलने वाली किरणें इस रात में अमृत बरसाती हैं, शरद पूर्णिमा की रात को दूध की खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखी जाती है। ऐसी मान्यता है कि चंद्रमा की किरणें खीर में पड़ने से यह अमृत समान गुणकारी और लाभकारी हो जाती हैं, जिसके सेवन से स्वास्थ्य लाभ होता हैं|

कब है शरद पूर्णिमा

13 अक्टूबर 2019, शुक्रवार को शरद पुर्णिमा का व्रत रखा जाएगा|

शुभ मुहूर्त

13 अक्टूबर 2019, शुक्रवार की रात, 12 बजकर 38 मिनट, 45 सेकेंड से शुरू होकर 14 अक्टूबर 2019, शनिवार को 2 बजकर 39 मिनट 45 सेकंड पर समाप्त होगा|

पूजा विधि

शरद पुर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर, व्रत का संकल्प लें और मान्यता के मुताबिक इस दिन पवित्र नदी, जलाश्य या कुंड में स्नान करे क्योंकि ऐसा करने से व्रत का फल अधिक प्राप्त होता हैं| व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान की प्रतिमाओं को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान की साज-सज्जा करने के बाद आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, गंध, अक्षत, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा इत्यादि अर्पित कर पूजा करे|

पूजा करने के बाद गाय के दूध से बनी खीर में चीनी मिलाकर आधी रात के समय भगवान श्री कृष्ण को भोग लगाएं। रात में जब चंद्रमा आकाश के मध्य में स्थित हो तब चंद्र देव का विधि-विधान से पूजा करें और बने हुये खीर का नेवैद्य अर्पित करे, भगवान को भोग लगाने के बाद रात को खीर से भरा बर्तन चांदनी रात में बाहर रख दें और दूसरे दिन उस खीर को ग्रहण करें क्योंकि इस खीर को ग्रहण करने से स्वास्थ्य लाभ होता हैं|

महत्व

शरद पुर्णिमा के दिन ही भगवान श्री कृष्ण महारास रचना प्रारंभ करते है। देवीभागवत महापुराण के मुताबिक, गोपियों के प्रेम को देखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने आज के दिन चंद्र को महारास का संकेत दिया था। चंद्रमा ने भगवान श्री कृष्ण का संकेत समझ कर अपनी शीतल रश्मियों से प्रकृति को आच्छादित कर दिया और उन्हीं किरणों ने भगवान श्री कृष्ण के चेहरे पर सुंदर रोली कि तरह लालिमा भर दी।

भगवान श्री कृष्ण के चेहरे पर सुंदर रोली कि लालिमा देखकर उनके अनन्य जन्मों के प्यासे बड़े-बड़े मुनि, महर्षि, योगी, और अन्य भक्त गोपियों के रूप में श्री कृष्ण लीला रूपी महारास में समाहित हो गए। श्री कृष्ण की वंशी कि धुन सुनकर अपने-अपने कार्यों में लीन सभी गोपियां अपना घर-बार छोड़कर वहां आ पहुचीं। श्री कृष्ण और गोपिकाओं का अद्भुत प्रेम देखकर चंद्रमा ने भी अपनी सोममय किरणों से अमृत वर्षा करना आरंभ कर दिया, इस अमृत वर्षा में भिंगकर गोपियाँ अमरता को प्राप्त हुई और भगवान श्री कृष्ण के अमर प्रेम कहानी की भागीदार बनी|

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