जानें, नेहरू और नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में क्या हैं समानताएं और क्या असमानताएं ?

किसी भी देश की विदेश नीति बहुत अहम होती है। विदेश नीति के जरिये ही हम दूसरे देशों से व्यापार को मजबूत बनाते हैं। देश की अर्थव्यवस्था भी इसी से जुड़ी हुई चीज है। अगर आपके संबंध चीन, रूस अमेरिका से अच्छे नहीं है तो आप विदेशी मुद्रा के भंडारण में बहुत पीछे रह जाएंगे। अगर आप दूसरे देशों में लोकप्रिय नहीं है तो आपके देश का पर्यटन काफी पीछे रह जायेगा। अगर आप अपने पड़ोसियों को आकर्षित नहीं कर पाएंगे तो आप एक सफल देश नहीं बन सकते। विदेश नीति स्थाई भी नहीं होती, इसमें परिवर्तन सरकारों के हिसाब से होता रहता है।

जब हमारा देश आजाद हुआ तब से लेकर 17 सालों तक हिंदुस्तान के विदेश मंत्री थे नेहरू। ऐसा कई लोग कहते हैं कि उन्होंने विदेश नीति की एक नीवं बनाई। दूसरे देशों से संबंध बेहतर किये। उसके बाद कई और विदेश मंत्री भी हुए अलग-अलग सरकारों में। अब पीएम मोदी की विदेशों में एक अलग इमेज बनी है।  ऐसे में सवाल यही है कि आखिर मोदी और नेहरू की विदेश नीति में क्या समानताएं और अंतर है। आइए जानते हैं।

नेहरू और पीएम मोदी की विदेश नीति का विश्लेषण

अगर पंडित नेहरू की बात करें तो उन्होंने अपने कार्यकाल में कई राष्ट अध्यक्षों को अपना मित्र बना लिया था। यही कारण रहा कि वो अमेरिका और सोवियत संघ की लड़ाई के बीच पिसते हुए राष्ट्रों का एक गुट निरपेक्ष संगठन बनाने में सफल रहे। हालांकि ये संगठन कभी प्रभावशाली नहीं हो पाया क्योंकि इस संगठन के पास साधनों की कमी थी। आपको बता दें कि पंचशील का सिद्धांत भी पंडित नेहरू की ही देन है। अब पीएम मोदी के सत्ता में आ जाने के बाद ये पंचशील सिद्धांत पंचामृत में बदल गया है।

अब गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी पीछे छूट चुका है। अगर दोनों सिद्धान्तों में अंतर की बात की जाय तो पंचशील सिद्धांत में शांतिवाद मुख्य स्तम्भ था पर पंचामृत जो भारतीय जनता पार्टी का विदेश नीति का दस्तावेज़ है उसमें सम्मान, संवाद, समृद्धि, सुरक्षा और संस्कृति और सभ्यता को विदेश नीति का स्तम्भ कहा गया है।

अगर पंडित नेहरू और पीएम मोदी की विदेश नीति में समानता की बात करेंगे तो हम यही पाएंगे कि दोनों ने ही विदेश नीति में व्यक्तिगत रिश्तों को बहुत तरजीह दी। नेहरू जी के दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष से सम्बंध कैसे थे ये सब जानते हैं वहीं पीएम मोदी किस तरह से जिनपिंग और पुतिन के मित्र बन गए हैं ये भी दुनिया देख रही है। मोदी लगातार विदेशी दौरे करते रहते हैं वहीं विदेशी मेहमानों को भारत आने का न्योता भी देते रहते हैं।

जो काम विदेश नीति सालों तक न कर सकी वो काम आसानी से  सुलझा लिए गए। उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद हो या सालों से पेंडिंग फ्रेंच लड़ाकू विमानों का सौदा हो। पीएम मोदी ने अपने मधुर रिश्तों से सबकुछ अपने पक्ष में किया। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात के अबुधाबी के युवराज और प्रभारी शासक से मोदीजी ने जिस प्रकार व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाए हैं उससे सारे खाड़ी के देशों में एक हर्ष मिश्रित आश्चर्य का भाव है।

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