इस गलती की वजह से हुआ था शिवलिंग का आरम्भ, जानकर यकीन नहीं करेंगे आप

हिन्दुओ के आस्था के प्रतीक भगवान शिव माने जाते हैं| 10वीं और 12 वीं शताब्दी कुछ अन्य धर्मों के लोगों ने शिवलिंग का गलत अर्थ निकाला और उन्होने शिवलिंग को भगवान शिव के गुप्तांग को माना, उनका मानना था की यह भगवान शिव का गुप्तांग हैं| जबकि वास्तविकता इसके विपरीत हैं| क्योंकि हर एक शब्द का अलग अर्थ होता हैं| संस्कृत में लिंग का अर्थ होता चिन्ह या निशान अर्थात शिवलिंग का मतलब शिव का प्रतीक माना जाता हैं|

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अब प्रश्न उठता हैं की आखिर इस शिवलिंग क्या हैं और इसका निर्माण कैसे हुआ तो हम आपको बताते हैं| शून्य, आकाश, अन्नत, ब्रहांण्ड और निराकार, परम पुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया| स्कन्द पुराण में आकाश को लिंग कहाँ गया| हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित हैं और आत्मा ऊर्जा से निर्मित हैं| इस प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक हैं| इससे ही शिवलिंग का निर्माण हुआ|शिवलिंग को बनाने के लिए शिव और शक्ति मिले नहीं थे बल्कि उन्होने एक योनि का निर्माण किया था और यह योनि ही हमारे लिए पूजनीय बनी|

अब प्रश्न उठता हैं की शिवलिंग का निर्माण कैसे हुआ| हमारे ऋषियों ने कैसे शिवलिंग का निर्माण किया| ये बात स्कन्द पुराण में लिखा गया हैं| आरम्भ में ऋषियों ने दीपक की रोशनी में भगवान का ध्यान करने का प्रयास किया| लेकिन ध्यान एकाग्र नहीं हुआ क्योंकि हवा चलने से दीपक की ज्योति इधर-उधर हिलने लगती थी और ध्यान उनका बट जाता था| एक लंबी अवधि तक हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान एकाग्र करने में सफलता हासिल नहीं कर पाये तो उन्होने इसका विकल्प ढूँढने का प्रयास किया और उन्होने दीप ज्योति निर्माण पत्थर से किया| इस प्रकार शिवलिंग दीप ज्योति हैं|

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