इस लड़की की मौत के जिम्‍मेदार हमसब है और कोई नहींं, कहानी पढ़कर शर्म से झुक जाएंगी नजरें

ये बात सच है कि तस्‍वीर में दिख रही इस लड़की की मौत के जिम्‍मेदार हम है इस बात को जानते हुए भी हम इस खबर को पढ़ रहे हैं। जिस लड़की के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं उसे सुनने के बाद हर कोई हैरान है। दरअसल एक तरफ हम ये बात करते हैं कि देश बदल रहा है लोग बदल रहे हैं लेकिन क्‍या ये सच है कि लोगों की सोच भी बदल रही है क्‍योंकि बदलाव तो तब कहा जा सकता है जब सोच में बदलाव आ जाए।

तभी तो एक नए समाज का निमार्ण होता है लेकिन ऐसा नहीं है जो बदलाव हम देख रहे हैं वो सिर्फ उपरी बदलाव है अंदर से लोगों की मानसिकता अभी भी संकीर्ण है और लोग नहीं चाहते हैं कि वो नई सोच को अपनाए क्‍योंकि ऐसा करने से उनकी विचारधारा बीच में आने लगती है इसलिए आज भी हम न्‍यू इंडिया और ओल्‍ड इंडिया के बीच ही जी रहे हैं।

आज इसी इंडिया में रहने वाली एक पढ़ी-लिखी लड़की को एक बार फिर से पुरानी विचारधारा के कारण मौत को अपनाना पड़ा आखिर क्‍यों लोग इतना मजबुर कर देते हैं किसी को की वो अपनी जान दे दे। ये पढ़ी लिखी लड़की सामाज की लड़ाई लड़ते लड़ते मौत को गले लगा लेती है वो आत्‍महत्‍या कर चुकी होती है। क्‍यों और कैसे वो तो हम आपको बताएंगे ही लेकिन क्‍या इस मार्डन इंडिया में सामाजिक अभिशाप के कारण भी कोई मर सकता है सवाल तो यही आता है और इसका भी हम सब ही दे सकते हैं।

जिस लड़की की हम बात कर रहे हैं उसके बारे में ये बात जान लेना बेहद जरूरी है कि अगर आज वो ज़िंदा होती तो अपने “पतिदेव” से ज्यादा कमा रही होती। लेकिन अफ़सोस की बात तो ये है की वो इस दुनिया में अब नहीं है।

IIT से एमटेक करने वाली मंजुला भोपाल की रहने वाली थी, एक वर्ष पहले ही मंजूला दिल्ली में पढ़ाई के लिए आई थी। सूत्रों के अनुसार, IIT दिल्ली के नालंदा अपार्टमेंट में पीएचडी की छात्रा मंजुला वाटर रिसोर्स में पीएचडी कर रही थी। मंजुला फ्लैट नंबर 413 में रहती थी। उसने शादीशुदा होने के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखी। उसके पति व अन्य परिजन भोपाल में रहते हैं। शाम साढ़े सात बजे के करीब पुलिस को पीसीआर कॉल मिली, जिसके बाद मौके पर पहुंची थाना हौजखास पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया।

वर्ष 2013 में उसकी भोपाल निवासी रितेश विरहा से शादी हुई थी लेकिन इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब मंजुला की दोस्त प्रगति मंडलोई ने ट्विटर पर कुछ ऐसे खुलासे किये है जिससे यह मौत कई सवाल खड़े करता है। प्रगति ने स्क्रीन्शोट्स ट्विटर पर अपलोड किये है जिनसे यह एक प्रताड़ना का मामला सामने आ रहा है। दरअसल मंजुला के ससुराल वाले 20-25 लाख रुपये की डिमांड कर रहे थे ताकि कोई बिजनेस शुरू कर सके और मंजुला को पीएचडी छोड़कर भोपाल आने की जिदद कर रहे थे। मंजुला के पिता ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया मुझे मंजुला को आईआईटी में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहिये था बल्कि वो पैसे दहेज के लिए जोड़ने चाहिए थे।”

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

              मंजुला इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद इस समाज में व्याप्त दहेज प्रथा जैसी कुरूतियों से हार मान गई। शायद उसे इस लालची और घटिया समाज के घटिया रवैय्ये का सामना करने के आगे अपना जीवन समाप्त करना आसान लगा। बेटी की मौत से से टूट चुका एक लाचार बाप जब आंसू भरी आँखों से अपनी बेटी की मौत का जिम्मेदार भी खुद को ही मानता है, तो जरा सोचिए हमारे समाज पर फिर भी इसका कोई प्रभावी असर नहीं पड़ता क्‍योंकि हम तो इसके आदी हो चुके हैं और आज एक मंजुला नहीं ऐसी कई मंजुला इसका शिकार हो चुकी होती हैं।

बदले में हम क्‍या करते हैं अफसोस जाहिर करते हैं, दो दिन आंसू बहाते हैं और तीसरे ही दिन अपने किसी परिजन की शादी में कितना दहेज़ मिला, कौन सी गाडी मिली इस पर बात कर रहे होते हैं। आखिर क्‍यों हममें से कोई इस चीज के लिए आवाज़ नहीं उठाना चाहते। गलती यही है कि हम कायर है और फेसबुक व सोशल मीडिया पर हर व्‍यक्ति क्रांतिकारी बनता है लेकिन क्‍या कभी आपने सोचा है असल जिंदगी में भी क्रांतिकारी बनने की। लड़की का परिवार मॉडर्न हो या देसी, लड़की डॉक्टर हो या इंजीनियर या हो पत्रकार! लड़का लायक हो या नालायक, लेकिन दहेज सभी को चाहिए! क्या अब समय की सबसे बड़ी मांग नहीं है कि मुंह बंदकर समाज के दोहरे मापदंड और लड़की को दहेज़ में तौलने मानदंडों और खोखली, ठरकी और लालची समाजिक व्यवस्थाओं के आगे घुटने टेकने की बजाय अपनी जान देकर नहीं बल्कि इनसे लड़ कर दोषियों को सजा दिलवाइ जाए।

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