आंखों की रोशनी व रीढ़ की हड्डी गंवाने के बावजूद नहीं मानी हार, कुछ इस तरह बदल ली जिंदगी

अक्सर देखा गया है जिन व्यक्तियों की आंखे नहीं होती है, किसी उम्र के पड़ाव में आँखों की रोशनी खो जाती है या चली जाती है या किसी दुर्घटना वश आँखों की रोशनी चली जाती है। वो अपने जीवन से हार मान लेते है। आज हम आप को ऐसे ही एक व्योक्ति के बारे में बताएंगे जिसके जज्बें ने हम सभी के लिए एक मिसाल कायम कर दी। जवानी में ही अपने आंखों की रोशनी खोने के बावजूद जिंदगी से हार नहीं मानी और अपनी अलग पहचान बनाकर लाखों लोगो के लिए मिसाल बन गए।

हम बात कर रहे है 32 वर्षीय सागर बहेटी जो बेंगलुरु में रहते है।क्लब क्रिकेट खेलकर सागर अपने सपने को जी रहे थे। मैच के शौक़ीन सागर एक दिन मैच खेलने के दौरान उन्हें ऐसा लगा कि गेंद उन्हें नहीं दिख रही है। डॉक्टरों के पास गए तो पता चला कि सागर स्टारगाडर्स नामक बीमारी है। इस बीमारी में आँखों की रोशनी धीरे धीरे उम्र के साथ कम होती जाती है। हैरान करने वाली बात डॉक्टर ने यह बताई कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। यह सुन कर सागर घबरा गए और उन्हें लगा कि जीवन का कोई मोल नहीं।

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अपने जीवन से हार मान चुके सागर को उस समय उनके परिजनों और दोस्तों ने उनका साथ दिया और अपनी अलग पहचान बनाने की सलाह भी दी। तब सागर ने दौड़ना शुरू किया और मैराथन में दौड़ने लगे। इंजीनियरिंग कर चुके सागर ने पहली बार कुर्ग वेलनेस मैराथन में दौड़े और उन्होंने 68 मिनट में अपनी दौड़ पूरी की। सागर ने इसके अलावा कई मैराथन में भाग लिया और इसी वर्ष में सागर ने बोस्टन मैराथन में भी भाग लिया था। वह मैराथन में दौड़ने वाले देश के एकमात्र दृष्टिहीन धावक हैं।

इसके बाद सागर स्पेन गए और स्काई डाइविंग के दौरान उनका पैराशूट बीच में ही अटक गया और वह अपने ट्रेनर के साथ जमीन पर गिर गए। मौत से वो तो बाल बाल बच गए लेकिन उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई जिसके कारण उनकी चार बार सर्जरी हुईं। इतनी घटनाओ से गुजरने के बावजूद सागर ने हार नहीं मानी और फिर दौड़ने को तैयार हैं।
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