Tuesday, December 12

…तो इस वजह से भगवान श्री कृष्ण ने किया था कर्ण का अंतिम संस्कार

महाभारत की कथा भारत के दो प्राचीन महाकाव्यों में सबसे बड़ा महाकाव्य है जिसकी रचना वेदव्यास जी ने की थी। आज हम आपको इसी कथा के एक ऐसे पात्र के विषय में बतायेगे जिसे देव पुत्र होने के बावजूद भी सामाजिक प्रतारणना का सामना करना पड़ा और उसे वो मान सम्मान नही मिला जिसका वो अधिकारी था बल्कि उसे तो समाज में अस्वीकार कर  दिया गया था।

हम बात कर रहे है दानवीर कर्ण की जिसकी वास्तविक माँ कुंती थी मगर वो उसे अपना नाम और अधिकार दोनों ही नही दे सकी क्योंकि उसका जन्म कुंती और पांडू के विवाह होने से पूर्व हुआ था। कर्ण सूर्य पुत्र था और उसे एक महान दानवीर भी माना जाता था क्योंकि कर्ण ने कभी मांगने वाले को कुछ भी देने से कभी मना नही किया और उसकी यही महानता आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण भी बनती है। इन सब बातो से अलग बात ये है की कर्ण ने महाभारत के युद्ध के समय अपने भाईयों का साथ छोड़ कर कौरवो का साथ दिया जो अन्नयाई थे, पापी  और कपटी भी थे। मगर इन सब के बावजूद भी भगवान् श्री कृष्ण ने अपने हाथो से कर्ण का अंतिम संस्कार किया।

जैसा की हम सब जानते है की कर्ण एक सूत पुत्र था क्योंकि उसका पालन-पोषण एक सारथी ने किया था और पाण्डव उससे काफी नफरत करते थे क्योंकि वो भी इस बात से अनजान थे की कर्ण उनका सबसे बड़ा भाई था और कुरुछेत्र में भी वो उनके शत्रु का ही साथ दे रहा था।युद्ध के दौरान कर्ण की मौत अर्जुन के हाथो हुई जरुर थी लेकिन उसकी मौत का तरीका श्री कृष्ण ने ही अर्जुन को बताया था। मगर सोचने वाली बात ये है की जब स्वयं भगवान ने कर्ण का वध कराया था तो उसका अंतिम संस्कार उनको हाथो क्यों हुआ,  इसके पीछे एक गहरा रहस्य है।

कर्ण एक बहुत बड़ा दानी राजा था तो भगवान कृष्ण ने अंतिम समय में उसके दानवीरता की परीक्षा ले ली और कर्ण से दान माँगा और कर्ण ने को अपनी संकल्प के अनुसार अपने सोने के दात तोड़ कर भगवान् को दे दिया तब श्री कृष्णा ने उसकी दानवीरता से प्रसन्न होकर उसे दान मांगने को कहा तो कर्ण ने उनसे वरदान के रूप में अपने साथ हुए अन्‍याय  को याद करते हुए अपने वर्ग के लोगो का कल्याण करने को कहा व दुसरे वरदान में भगवान कृष्णा का जन्म अपने राज्य में लेने के लिए  माँगा तथा तीसरे वरदान में वो अपना अंतिम संस्कार ऐसे इंसान के हाथो माँगा जो की पाप मुक्त हो जिसे सुनकर भगवान  खुद दुविधा में पड़ गए।

अंत में उन्हें ऐसा कोई नही मिला जो पाप मुक्त हो ईसलिए अपने वचन को पूर्ण करने के लिए उन्हें कर्ण का अंतिम संस्कार अपने हाथो ही करना पडा और इस तरह से कर्ण  के अधर्म का साथ देने के बावजूद भी भगवान के हाथो  अपना अंतिम  संस्कार करवा लिया और वीरगति को प्राप्त हुआ।

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