जानें आखिर हिन्दू धर्म में क्यों किया जाता है नवजात शिशु का मुंडन, क्‍या है इसके पीछे का रहस्‍य

सदियों से हिन्दू धर्म को परम्पराओ से भरा हुआ धर्म माना जाता है और इस धर्म में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक तमाम तरह की परम्पराओ का पालन करना पड़ता है। उन्ही परम्पराओ में से एक है व्यक्ति के जन्म के कुछ समय बाद में मुंडन संस्कार की परंपरा, जो बेहद अहम मानी जाती है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को पहले हमारे पूर्वज मानते थे और अब हम मानते है। करीब-करीब हर हिन्दू परिवार इस परंपरा का वर्षों से पालन करता आ रहा है, शायद इसलिए भी क्योंकि हमारे जीवन में इनका अपना विशेष महत्व रहा है।

शास्त्रों के अनुसार मुंडन संस्कार में शिशु के सिर के सारे बाल उतारे जाते हैं, जिसे हिन्दुओं में बहुत ही पवित्र संस्कार माना जाता है। अक्सर इस तरह के संस्कारों को निभाने के लिए एक विशेष मुहूर्त का होना अनिवार्य होता है। बताना चाहेंगे की हिन्दू धर्म में इसे चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है, क्योंकि अगर आपने ध्यान दिया हो तो जब शिशु का मुंडन होता है तो विभिन्न मंत्रों व पूजा पाठ की प्रक्रिया भी की जाती है।

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आज हम आपको इसी परंपरा से जुड़ी कुछ ख़ास जानकारी देने जा रहे है कि कब और किस समय इस संस्कार को करने का मुहूर्त शुभ होता है साथ ही मुंडन संस्कार करने के पीछे क्या तथ्य है इसके बारे में भी बताएँगे। इसके पीछे कई वैज्ञानिक वजह भी बताए गए है जो काफी हद तक सही साबित हुए है।

वैज्ञानिको की माने तो इस मान्यता के अनुसार जब सिर के सारे बाल कटवाएं जाते है तो उसी के साथ सिर की अनावश्यक गर्मी भी निकल जाती है। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि जन्म के बाद बच्चे के सिर पर जो बाल होते हैं उसमे विभिन्न तरह के कई कीटाणु होते हैं, जो मुंडन कराने से पूरी तरह खत्म हो जाते हैं।

बताना चाहेंगे की ऐसा भी माना गया है कि मुंडन संस्कार से मनुष्य का मानसिक विकास भी होता है। कुछ जानकारों का मानना है की गर्भ में केशों के कारण शिशु के सिर में खाज, फोड़े, फुंसी आदि चर्मरोगों के होने तथा लंबे बालों के कारण सिर में जूं, लीख आदि समस्या भी मुंडन के साथ दूर हो जाती है।

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