Friday, December 15

अमरनाथ गुफा से जुड़े ये रहस्य आपको कर देंगे हैरान

भगवान शिव को समर्पित यह गुफा 12,756 फीट की उंचाई पर स्थ‌ित है। अमरनाथ की यह पव‌ित्र गु्फा श्रीनगर से 141 किमी दूर है। गुफा लगभग 150 फीट क्षेत्र में फैली हुई है और इसकी ऊंचाई करीब 11 मीटर है। इस पव‌ित्र गुफा की खोज सोलहवीं शताब्दी के आस पास हुई है। इस गुफा की जानकारी कश्मीर का इत‌िहास बताने वाली क‌िताब राजतंरगणी में भी क‌िया गया हैं।

रास्तों से जुड़ा रहस्य

भगवान श‌िव ने अमर कथा सुनाने से पहले अपनी कई चीजों को रास्ते में छोड़ द‌िया था। बाबा बर्फानी के दर्शन के ल‌िए प्राय: पहलगाम वाला रास्ता सबसे ज्यदा प्रचल‌ित है। लेक‌िन अमरनाथ की गुफा तक पहुंचने के ल‌िए एक और मार्ग सोनमार्ग बालटाल मार्ग से भी जाया जा सकता है। लेक‌िन पौराण‌िक कथाओं के मताब‌िक भगवान श‌िव ने गुफा तक पहुंचने के पहलगाम वाला मार्ग चुना था।

पहलगाम अमरनाथ यात्रा का आधार शिविर है। यहां यात्रियों की सुरक्षा जांच की जाती है। यहां यात्री रात में आराम करते हैं। सुबह चंदनवाड़ी के लिए यात्रा शुरू होती है। चंदनवाड़ी की कठिन चढाई चढकर यात्री पिस्सू टॉप पहुंचते हैं। पिस्सू टॉप तक का रास्ता काफी मुश्किल है। कहते हैं कि कभी इस स्थान पर देवताओं का और राक्षसों का युद्ध हुआ था। देवता जीत गये। उन्होंने राक्षसों को पीस-पीसकर उनका ढेर लगा दिया। उस ढेर को ही पिस्सू टॉप कहते हैं। पिस-पिसकर लगे ढेर को पिस्सू नाम दे दिया।

अमरनाथ यात्रा में शेषनाग झील का बहुत महत्त्व है। यह पहलगाम से लगभग 32किलोमीटर दूर है। यह झील सर्दियों में जम जाती है। इसके चारों ओर चौदह-पन्द्रह हजार फीट ऊंचे पर्वत हैं। यहां की सुंदरता देखते ही बनती है। रात में जब ऊंचे पहाड़ों की परछाई झील पर पड़ती है तो ऐसा लगता है कि शेषनाग फन फैलाए बैठे हुए हैं। यह दृश्य देखने के लिए यात्री देर तक यहां खड़े रहते हैं। शेषनाग से चलकर यात्री पंचतरणी पहुंचते हैं। यहां पांच नदियां आकर मिलती हैं इसीलिए इसे पंचतरणी कहते हैं। इन पांच नदियों को पांच गंगा कहा जाता है। यहां पित्तर कर्म भी होते हैं। यहां से अमरनाथ गुफा की दूरी छह किलोमीटर है।

श‌िवल‌िंग से जुड़ा अद्भुद सच

पव‌ित्र गुफा में बनने वाले श‌िवल‌िंग या ह‌िमल‌िंग के बनने की कहानी क‌िसी चमत्कार से कम नहीं है। आज तक व‌िज्ञान भी ह‌िमल‌िंग के बनने की गुत्थी नहीं सुलझा पाई है। इस शिवलिंग का निर्माण गुफा की छत से पानी की बूंदों के टपकने से होता है। पानी के रुप में ग‌िरने वाली बूंदे इतनी ठंडी होती है कि नीचे गिरते ही बर्फ का रुप लेकर ठोस हो जाती है। यह क्रम लगातार चलता रहता है और बर्फ का 12 से 18 फीट तक ऊंचा शिवलिंग बन जाता है।
जिन प्राकृतिक स्थितियों में इस शिवलिंग का निर्माण होता है वह विज्ञान के तथ्यों से विपरीत है। विज्ञान के अनुसार बर्फ को जमने के लिए करीब शून्य डिग्री तापमान जरुरी है लेक‌िन अमरनाथ यात्रा के समय इस स्थान का तापमान शून्य से उपर होता है।

अमरनाथ गुफा में बर्फ के श‌िवल‌िंग के बाद कबूतरों के एक जोड़े की उपस्थ‌ित‌ि भी एक तरह रहस्य है। कोई नहीं जाना क‌ि ये जोड़ा क‌ितना पुराना है। इस जोड़े के लेकर एक प्रस‌िद्ध कथा भी प्रचल‌ित है। जब भगवान श‌िव पार्वती को अमरकथा सुना रहे थे तब उस गुफा में एक कबूतर का जोड़ा भी उपस्थ‌ित था ज‌िसने वह पूरी कथा स‌ुनी और हमेशा के ल‌िए अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है। इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा।

गुफा की खोज से जुड़ी रोचक कहानी

16वीं सदी में इस गुफा की खोज हुई थी। गुफा की खोज को लेकर कई कहानियां प्रचल‌ित हैं परंतु सबसे प्रचलित कहानी एक गड़रिये की है। घाटी में रहने वाले बूटा मलिक नामक एक मुस्ल‌िम गड़रिये को किसी दिव्य पुरूष ने कोयले से भरा हुआ थैला दिया था। थैले को लेकर जब वह घर पहुंचा तो थैले में उसे कोयले के स्थान पर सोने के सिक्के मिले।
खुशी के मारे वह दौड़ता हुआ उसी स्थान पर गया जहां उसे दिव्य पुरूष मिले थे। उस स्थान पर पहुंचकर बूटा मलिक को वह दिव्य पुरूष नहीं मिले परंतु यह गुफा और शिवलिंग मिला। इस खोज का श्रेय इस मुस्ल‌िम गड़र‌िए को जाता है। आज भी चढ़ावे का चौथाई उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: